Categories
शायरी (shayari) kavita(hindi) poetry

“शाम”

शाम हुई नहीं कि
उनका खेल फिर शुरू होगया
हम गर्म चाय बनाए बैठे हैं
और वो बर्फ मिलाए बैठे हैं।

अब झगड़ा ना हो तो फिर क्या हो
हम जहां मुंह बनाए बैठे हैं
वो वहीं मुंह पे हल्की सी,
मुस्कराहट लाए बैठे हैं।
फिर यही देखकर हम आंखो में
अंगार लाए बैठे हैं,
वहीं ग्लास को होठों के ज़रा पास लाकर
आंखों में वो,
और प्यार लाए बैठे हैं।

और इस तरह हर शाम हम, गरमाए रहते हैं
वहीं बोतल खोले वो शाम से, हमें बेहकाय रहते हैं।